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Showing posts from February, 2017

मेरा पालनहार मेरा शिक्षक

मेरा सिर तो मेरे शिक्षक का पाँव, मैं सीखने का अर्जुन तो मेरा शिक्षक सिखाने का कृष्ण, मैं कलयुग का घोर मतलबी तो मेरा शिक्षक सतयुग का पालनहार।। कुछ ऐसा भेद है मेरे और मेरे शिक्षक के बीच, एक रोएं बराबर भी नहीं मैं। हम बेहया तो हो ही चुके हैं। यही कारण है जो शिक्षक जबरजस्ती हमें संस्कार भी सीखा रहे। स्कूलों में नियम के तौर पर कक्षा में शिक्षक के आगमन और निकासी के समय खड़े हो साम्मान प्रकट करना बताया गया की बच्चे हैं बड़े होने तक आदत हो जायेगी, खुदबखुद सीख़ जायंगे। परंतु इस कलयुगी कोयलेनुमा खान में कालिख़ पुत ही जा रही। अब इस नियम से दो प्रभाव पड़ते। पहला के शिक्षक का आत्मविश्वास बढ़ता जो प्रभावी शिक्षण के लिए आवश्यक है। दूसरा हमारे बर्ताव से शिक्षा लेते हुए शिक्षक को अपने परिश्रम की अति मचाने की भावना उठती। यह एक ढंग था। इस रिश्ते की पवित्रता को ज़ाहिर, फ़ैलाने की आवाज़ थी गुड़ मॉर्निंग। साम, दाम, दंड , भेद कौन सी जुगत बची हो जिसे शिक्षकों ने न आजमाया हो। पर बेहयाई का आलम तो यहाँ तक आ पंहुचा के शिक्षक बगल से गुज़रे तो हमारा शीश साम्मान में झुकने के बजाये आसमां से नैन-मटक्के करता है। शाय...