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मेरा पालनहार मेरा शिक्षक

मेरा सिर तो मेरे शिक्षक का पाँव, मैं सीखने का अर्जुन तो मेरा शिक्षक सिखाने का कृष्ण, मैं कलयुग का घोर मतलबी तो मेरा शिक्षक सतयुग का पालनहार।।

कुछ ऐसा भेद है मेरे और मेरे शिक्षक के बीच, एक रोएं बराबर भी नहीं मैं।
हम बेहया तो हो ही चुके हैं। यही कारण है जो शिक्षक जबरजस्ती हमें संस्कार भी सीखा रहे। स्कूलों में नियम के तौर पर कक्षा में शिक्षक के आगमन और निकासी के समय खड़े हो साम्मान प्रकट करना बताया गया की बच्चे हैं बड़े होने तक आदत हो जायेगी, खुदबखुद सीख़ जायंगे। परंतु इस कलयुगी कोयलेनुमा खान में कालिख़ पुत ही जा रही। अब इस नियम से दो प्रभाव पड़ते। पहला के शिक्षक का आत्मविश्वास बढ़ता जो प्रभावी शिक्षण के लिए आवश्यक है। दूसरा हमारे बर्ताव से शिक्षा लेते हुए शिक्षक को अपने परिश्रम की अति मचाने की भावना उठती। यह एक ढंग था। इस रिश्ते की पवित्रता को ज़ाहिर, फ़ैलाने की आवाज़ थी गुड़ मॉर्निंग।


साम, दाम, दंड , भेद कौन सी जुगत बची हो जिसे शिक्षकों ने न आजमाया हो। पर बेहयाई का आलम तो यहाँ तक आ पंहुचा के शिक्षक बगल से गुज़रे तो हमारा शीश साम्मान में झुकने के बजाये आसमां से नैन-मटक्के करता है। शायद हमारी बदकिस्मती को भगवान ने ही मढ़ हमें अँधा कर दिया है जो अपने जीवन का निचोड़ लुटाने वाले को निराश कर देते हैं। जहाँ शिक्षक अपने स्तर से उतर हमारा दोस्त बन दोस्ताना अंदाज़ में ही कुछ बना देने की चेष्टा कर रहे तो वहीँ हम अपने स्तर से उड़ सर चढ़ रहे। पढ़ने-पढ़ाने के चक्कर में न जाने कब उन्होंने अपने स्तर तक का बलिदान दे दिया पता ही नहीं चला और हम?
बीते रोज़ हुई एक घटना ने मुझे यह लेख लिखने को विवश कर दिया। घटना की पात्रता यथासम्भव गुप्त होगी। यह आवश्यक है। निष्पक्ष विचार पैदा करने के लिए। लेख का प्रयोजन मात्र इतना की मेरी गलती कहूँ या निर्णय से कोई सीख़ ले सके।
कक्षा में मेरी एंट्री। मे आई कम इन?
शिक्षक- फोटोकॉपी कहाँ है?
मैं- (गुरु) नीचे दुकान से मेरा मित्र फोटोकॉपी करा ला रहा है।
शि- बैठो।।
हाज़ीरी के समय
शि-     बेटा मैं आपको अटेंडेंस नहीं दू*।। (प्रेम पूर्वक)
मैं-      क्यों ***(गुरु), (सम्मान पूर्वक)
शि-     बहुत समय दिया जा चूका अब और नहीं।।
मैं-      कुछ समय और बस ला ही रहा होगा।
शि-     काफ़ी समय दिया जा चूका, आपको पहले तत्पर रहना                     चाहिए था।।         
मैं-      (गुरु) जब किताब खरीदने को समय दिया जा रहा तो    फोटोकॉपी में क्यों नहीं? (घबरा कर ऊँचे स्वर में)
शि-     ये बहस मुझसे मत करना।
मैं-       मैं बहस नहीं कररहा, मात्र पूछ रहा।
शि-      जो भी कहना है अधिकारी के समक्ष कहना। (अपनी   जगह से आगे बढ़ते हुए) बाहर निकल जाओ यहाँ से( चीखते हुए)
मैं-       (अपने आसन से खड़ा हुआ)
शि-      बाहर निकल जाओ। (इतना कह मेरा शिक्षक अपने स्थान पर लौट गया।
मैं-        **(गुरु) यह तरीका सही नहीं है।
शि-       मुझे तरीका मत सिखाओ,
मैं-        (इतना घटने के बाद कक्षा में बैठना मुनासिब न समझा, बहार निकलते हुए)  (गुरु)*** प्लीज्, आप अधिकारी के सामने ज़रूर बात करना।
इस घटना से स्तब्ध था। अनायास ही मुझे निकाला गया। मेरे साथ अन्याय हुआ है। यही कुछ विचार मेरे मस्तिष्क में बहार आते उठे।
( मेरा नाम देव अवश्य है पर मैं कोई देवता नहीं, इस घटना से पूर्व भी मुझे मेरे शिक्षकों ने शिक्षा हेतु फटकार लगाई है। कई शिक्षकों ने कइयों बार। पर मैंने शीश झुका उनके आदेश का पालन किया है)
इस घटना के बाद मैंने उस कक्षा का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। कारण ठोस थे। हालाँकि मेरे इस कदम से भलाई सीधे तौर पर किसी की न होकर उल्टे मेरा घाटा था। फेल हो जाता। बैकलॉग आ जाती। अट्टनडेंस पूरी न होती। मगर फैसला मंज़ूर था। इन सभी के उपरांत एक बात यही बताऊ की जो भी हुआ इसका कोई भी असर मेरे अंदर मेरे शिक्षक के प्रति साम्मान, उनके प्रतिबिम्ब पर न पड़ा। वह मेरे लिए अब भी उतने ही सम्मानजनक थे जितने पहले।
उस कक्षा को देखने का दृष्टिकोण मेरे लिए कलयुग में सतयुग के एहसास से कम न था। मेरे शिक्षक द्वारा कक्षा संचालित करने के ढंग से मुझे हर्ष होता। जैसे कक्षा में घुसने पर बगैर अनुमति प्रवेश निषेध।। कक्षा समाप्त होने पर सभी को एक नैतिक जिम्मेदारी निभानी थी जो हमे उठ शिक्षक का धन्यवाद देना था। यह सभी कृत्य न मात्र हमें व्यवहारिक ख़रा बनाते थे। बल्कि हर कार्य की एहमियत भी दर्शाते। मेरे कई मित्रों ने मेरे सामने इन नियमों का विरोध ज़ाहिर किया पर मैंने उनका विरोध किया।
घटना को बीते दो सप्ताह से अधिक हो चुके थे, मैं कक्षा से नदारद था। कुछ दो सप्ताह बाद मेरे साथ - साथ दो अन्य विद्यार्थियों के खिलाफ उन्ही शिक्षक द्वारा अनुशासन के सन्दर्भ में शिकायत दर्ज की गई। अधिकारी के समक्ष शिक्षक ने हमारी पढाई की चिंता ज़ाहिर करते हुए शिकायत दर्ज कराने की बात कही। इससे ठीक एक दिन पहले मेरे साथ मित्र मंडली ने शिक्षक बदलने हेतु आवेदन का निर्णय लिया।
इस मोड़ पर यह घटना खतरनाक थी। दूरगामी होकर कहूँ तो विनाशकारी थी।
जो बनाने का हुनर रखता है वह उखाड़ फेंकने का दम भी। यह सत्य है। शायद अगर कोई शिक्षक किसी विद्यार्थी को प्रताड़ित करने की ठान ले तो माँ बाप भी इतनी शक्ति, तरीके न रखते होंगे एक पुत्र पर जितना एक शिक्षक का अपने ही शिष्य पर रखता है। मेरा तात्पर्य मात्र क्षमता से है। ऐसा व्यवहारिक तौर पर मेरे इर्द-गिर्द से कोई अभिप्राय नहीं।


इस मोड़ पर आकर यह घटना एक सामाजिक ढांचे में अपने योगदान को भ्रष्ट करना प्रतीत हो रहा था। सामाजिक संरचना को प्रभावित करते इस शिकायत से था। जो अपने आप में ही अपनी शक्ति प्रदर्शन की हुंकार भर रहा था। शिक्षक- छात्र के पवित्र रिश्ते में भंग थी यह शिकायत। ऐसा प्रतीत होता मनो मुझ पर कोई अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता हो।
अगर चाहता भी हो तो किस पर? मुझ पर? मुझ अदने पर?
मैंने तो अपने जीवन को उन चरणों में ही समर्पित कर रखा है जिसकी धूल के लायक भी नहीं।
मेरा आज नहीं तो कल किसी और क्षेत्र में गुज़रेगा। परंतु एक शिक्षक उड़ता विस्फोटक (सकारात्मक) है। आज यहाँ तो कल कही और अपने ज्ञान से समाज को प्रज्ज्वलित करेगा। गरिमा पर पहले ही सवालिया निशान झेल रहे शिक्षक जगत से और गलतियों की उम्मीद नहीं की जा सकती। जिसने बड़े-बड़े सिकंदर खड़े किये। अमर चंद्रगुप्त, अर्जुन, प्रतिबिम्ब मात्र से कर्ण सा धीर। यह विस्फोटक शुभ हाथों में कल्याणकारी है लेकिन दुष्ट हाथों में विनाशकारी। किसी भी समाज को उठाने या उखाड़ फेंकना इनके वश में है। निश्चय में है।
अतः मैं ऐसे विध्वंशक बीमारी को फैलने न दे सकता था। जिसके उपचार(माफ़ी) में शायद यह कदम उठाया। शायद यह मेरी ही गलती हो। मेरी ही सोच भ्रमित हो। सत्य का ज्ञान न हो। पर अगर ऐसा हुआ तो संभव है मैं क्षमा के पात्र नहीं हो सकता। इसका भोग अवश्य मिलेगा मुझे।
चरण वंदन।।

Comments

  1. Dev ko apne bheetar Mahadev ke gunh bhi bharane honge..

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  2. यथासंभव प्रयास करूँगा मैम।। धन्यवाद

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  3. This comment has been removed by the author.

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