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जीवन

कौन थाह लगा सका इस यात्रा का,
हर एक शिकार है अपने चश्मे का।

कुछ पुरुष तो कुछ पशू कहाए।
बुनियादी औज़ारों ने सिखाया प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष का पाठ,
और आज तथ्य हुए जीवन को तौलने का औज़ार।

घोर असमंजस की यह राह,
किधर खुले ठहरे दरिया का प्रवाह।

यह कैसा इम्तेहान है जहाँ निगरानी नहीं।
क्या तुमने हमे इतना सभ्य जाना है।

क्यों दुःख देत है स्वयं और अंशों को,
शायद यह खेल है खरे विष दंतों का।
यकीं कैसे करूँ बूढ़ी अम्मा का,
मलेच्छय भी उतना ही अडिग विश्वासी अपने सिद्धांतों का।

शायद ऊपर तू मुझ पर हँसे,
के अपना स्वरुप तो जन्मते ही दिखाया।
फिर उस रूप को निर्दोष कन्याओं की हत्यारन क्यों बनाया।

शायद तूने मनुष्य न बनाय होंगेे,
एकल ह्रदय(मन, भावना) बना छोड़ा होगा,
जिसके विरोध मस्तिष्क उठ खड़ा हुआ होगा।

न्याय-अन्याय, पाप-पुण्य, सत्य-असत्य सब तेरे वजूद से ही हैं शायद।
गर तू नहीं तो यह शुन्य हुए।

शायद इस रहस्य पर उजाला तभी पड़े जब इन आँखों में अँधेरा,
अन्यथा इसका नहीं है कोई हल शायद ।।

Comments

  1. Bahut badiya prayaas bhawnao ko shabdo ke maadhyam se vyakt karne ka....saadhuvaad

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