राजनीति...!! एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही जनमानस के मस्तिष्क में भिन्न भिन्न मत जल उठते हैं कुछ लोग इसे एक दलदल का नाम देते हैं तो कुछ इस शब्द की ओर लालसा भरे निगाओं से टकटकी लगाए रहते हैं तो कुछ इसे अपने निजी स्वार्थ के लिए एक शस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं। चाहे जो भी कह लें लेकिन एक स्वच्छ राजनीति और राजनीतिज्ञ की ज़रूरत आज सम्पूर्ण विश्व को है।
कहते हैं नाम का प्रभाव मनुष्य शख्सियत पर ज़रूर पड़ता है। यह बात कितनी सही है इस बात का ज्ञान मुझे नहीं पर इतना ज़रूर है की राजनीति शब्द का प्रभाव राजनीतिज्ञों पर बखूबी पड़ा है। अरे जिस शब्द में ही राज करने का प्रलोभन हो उससे सेवा की उम्मीद ही कैसे की जा सकती है? कभी अटल जी , शाश्त्री जी जैसे नेताओं ने भारतीय राजनीति को नया आयाम दिया तो वहीँ ए राजा, कनिमोझी जैसों ने कलंकित। आपने नेताओं को किसी निम्न पद पर आसक्त व्यक्ति को गालियाँ देते या अपने शक्ति का प्रदर्शन करते अक्सर देखा ही होगा।
• राजनीति नहीं सेवानीति
पर आज बदलते युग के साथ-साथ समय इस शब्द में भी परिवर्तन चाहता है। राजनीति से सेवानीति में तब्दील होना और इस शब्द के मूल अर्थ की सार्थकता ही इस कार्य के असल प्रयोजन की उपलब्धि है। राजनिति और सेवानीति में वही फर्क है जो एक नेता में चुनाव जीतने के बाद और चुनाव का समय आने पर होता है। राजा महाराजाओं के दरबारों और तानाशाही व्यवस्था को हटाने का कार्य जिस लोकतंत्र ने किया वहीँ इस व्यवस्था के अपने ही अलग खोट देखने को मिलते हैं। शांतिप्रिय हिटलर, फासीवाद जैसे शब्दों के अविष्कारक मुसोलिनी, उदारवादी गद्दाफ़ी के इतिहास को टटोलें तो मालूम होता हैे कि इन लोगों ने राजनीती शब्द के शाब्दिक अर्थ पर अधिक ज़ोर दिया बजाये मौलिक अर्थ के। इस शब्द परिवर्तन से कुछ हो न हो लेकिन जिन लोगों को "राजनीति" शब्द से एलर्जी हो चुकी है उनके लिए उम्मीद की नई किरण ज़रूर जागेगी।
•बी. ऐ. (B.A.) की गिरती साख़
यह बात किसी से छुपी नहीं है की कला विभाग (बी.ए/एम.ए) की डिग्री इस आधुनिक युग में सिर्फ शादियों के दहेज़ में बढ़ोतरी मात्र उपयोगी समझी जाती है। व्यक्तित्व विकास की इस अद्भुत संग्रचना वाले विषय के बोध का स्तर कुछ इस प्रकार हो चला है के आज जब मैं उ०प्र० से पंजाब बी०ऐ० पढ़ने आने की बात करता हूँ तो लोग का जवाब आता है... इतनी दूर वो भी बी०ऐ० पढ़ने, ज़्यादा पैसे हो गए हैं क्या?
यही नहीं कुछ जगहों पर तो यह भी सुनने को मिला की मौज करना है तो बी०ऐ० कर लो। कहीं न कहीं बी०ऐ० को ऐसी उपाधियाँ दिलाने में हमारे शीर्ष पर विराजमान विषयों के आयोजक भी भागीदार हैं। इन आलोचनाओं को बल देने वालों में मेरे रिश्तेदार, मित्र, छात्र और कुछ शिक्षक गण भी शामिल हैं।
यही नहीं कुछ जगहों पर तो यह भी सुनने को मिला की मौज करना है तो बी०ऐ० कर लो। कहीं न कहीं बी०ऐ० को ऐसी उपाधियाँ दिलाने में हमारे शीर्ष पर विराजमान विषयों के आयोजक भी भागीदार हैं। इन आलोचनाओं को बल देने वालों में मेरे रिश्तेदार, मित्र, छात्र और कुछ शिक्षक गण भी शामिल हैं।
मगर मेरे गणित से बी०ऐ० अर्थात कला के विषयों का पाठन प्रत्येक क्षेत्र के छात्रों के लिए अनिवार्य होना चाहिए। यह कला की वो पद्वति है जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास संभव है। मैंने जितना बी०ऐ० को जिया है उसके अनुसार यह एक विविध विषयों का ढांचा है जिससे व्यक्ति को न सिर्फ जीवन में उपयोगी सम्पूर्ण विषयों का बोध होता है बल्कि विषयों को ग्रहण करने का सार्थक माध्यम भी मालूम होता है।
अतः इस गिरती साख़ को सँभालने का कार्य भी सेवानीति द्वारा संभव है।
•लवली को सेवानीति की आवश्यकता
देश-विदेश से आये हज़ारों छात्रों को शिक्षा समेत विद्यालय परिसर के अंदर एक अपनी ही दुनिया प्रदान करने वाली लवली हर भौतिक सुख सुविधाओं से लैस है। चाहे बात शौपिंग मॉल की हो या अस्पताल की, क्लब की हो या पार्क की, हॉस्टल सहूलियत की हो या सुरक्षा की, उमस रहित कक्षाओं एवं होस्टलों की हो या यू०एम्०एस०(ums) की। हर क्षेत्र में देश को अनेक नौजवानों से काबिल नौजवान देने की हो या परिसर के अंदर स्वच्छता एवं हरियाली का उदहारण पेश करने की। विद्यार्थियों के कला को निखारने हेतु DSA की हो या विद्यार्थियों को नविन विचारों से सम्बोधन हेतु AUDI की।
इन तमाम सुविधाओं और असीम सामर्थ्य वाले विश्वविद्यालय को कथित योगदानों के उपरांत अगर राजनीति अर्थात सेवानीति से वंचित रखा जाता है तो यह स्वयं लवली से गद्दारी होगी। जहाँ एक तरफ अभियंत्रिकीय, चिकित्सीय, वाणिज्य, कला समेत हर क्षेत्र के छात्रों को नवीन शिक्षा के साथ नौकरी में उच्च स्थापना दिलाने का भरपूर प्रयास किया जाता है वहीँ दूसरी तरफ देश को एक भी राजनीतिज्ञ देने में लवली नाकाम रही है।
जब बात सेवानीति की हो रही हो तो लवली जैसी निजी संस्था में सेवानीतिक पार्टियाँ कौन सा कार्य करेंगी यह सवाल उठना लाज़मी है। परंतु इन कार्यों को कैसे, क्यों, कहाँ, कब करना है इन सभी बातों को एक व्याख्यान में समेटना कठिन होगा। इन बिंदुओं पर अधिकारी और छात्रों की संगठित चर्चा महत्वपूर्ण है। हमारा समाज जिन पैमानों की उम्मीद भारतीय राजनीतिक व्यवस्था से करता है ठीक उसी प्रकार की सेवानीतिक व्यवस्था को सम्पादित करना जिससे शिक्षा की गुडवत्ता पर भी कोई आंच न आये और इस लेखन का उद्देश्य भी पूर्ण हो। जिस प्रकार गुजरात मॉडल से पुरे हिंदुस्तान में विजय पताका फहराई गई है क्या उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व को लवली मॉडल देने की चेष्टा गलत है?
इस देश में राजनीती के कुपोषण का उदहारण देखने के लिए आपको ज़्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं लवली जैसी बड़ी संस्था में पढ़ने वाला हज़ारों के कपडे पहनने वाला छात्र जब लवली के मुख्य द्वार से निकलता है तो उसके सामने कुछ भूखे, बदहाल बच्चों को छात्रों के सामने चन्द सिक्कों के लिए हाथ पसारता देख यहाँ की आर्थिक संतुलन का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यकीनन राजनीति जैसी नाकारात्मक छवि का विरोध लवली जैसी निजी संस्था में संभव है मगर जिस देश में एक चाय वाले के अपनी पृष्ठभूमि का ऐसा सजीव उदाहरण हमारे सामने हो।
जिस संस्था ने खुद AICTE की मान्यता के लिए हलवाई और लड्डू-पेड़ा की पृष्ठभूमि के कारण एक नवीन विचार को साकार करने में कठिनाई झेली हो उस संस्था से राजनीति की नाकारात्मक छवी और इतिहास को दरकिनार कर उसके साकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने की उम्मीद की जा सकती है।
~ लवली का एक कदम सेवानीति की ओर ~
Well said Dev...!!
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ReplyDeleteधन्यवाद अभिषेक जी...!
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