अगर आपको भी छोटे लेख, स्टेटस, क्विक फैक्ट्स पढ़ अधूरी जानकारी जुटाने की आदत है तो इस लेख को पढ़ने के लिए आपको थोडा समय लेने की ज़रूरत है।
भारत में जब बच्चा जन्म लेता है तब सबसे पहले उसके कानो में हिंदी सुनाई देती है (t&c apply)। पर शिक्षा जगत में आते ही बच्चे के ऊपर बड़े ही सुनियोजित तरीके से अनजाने में ही सही पर अंग्रेजी को मॉडर्न, फैशनेबुल, डेवलप्ड बोल कर इसकी चादर चढ़ाई जाती है। अंग्रेजी का आधिपत्य शुरू होता है स्कूलों से जहाँ न चाहते हुए भी विद्यार्थियों को अंग्रेजी सीखनी पड़ती है या सिख दी जाती है। उदहारण के तौर पर पंजाब में बुलेट( दो पहिया वाहन) का बड़ा शौक है। यहाँ बच्चे से लेकर बुड्ढों को भी इस वाहन को चलने का खुमार होता है। यह सिर्फ पंजाब में ही नहीं बल्कि कई राज्यों की बात है।ग़ुलामी के दिनों में बुलेट अँगरेज़ अधिकारीयों द्वारा इस्तेमाल की जाती थी और अँगरेज़ इसे अपनी सहूलियत के कारण इस्तेमाल करते थे क्योंकि बुलेट को बनाने वाली कंपनी (रॉयल इंगफील्ड) ब्रिटेन की कैम्पनी है और उन्हें सस्ते दामों पर उपलब्ध
गत दिनों अपने भावी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का एक ट्वीट पढ़ा, जिसे पढ़ मन गर्व से सन गया। ट्वीट में इस बात का जिक्र था की आने वाले समय में डिजिटल मीडिया में तीन भाषाओं का दबदबा रहेगा, 1)अंग्रेजी, 2) चीनी, और तीसरा हिंदी। और यह ज़रूर होगा। दुनिया 16 प्रतिशत आबादी देने वाला भारत हर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखता है।
भारत एक विविधता (diversity) पूर्ण देश है, चाहे बात धर्म की हो या भूगोल की या बात हो भाषाओँ की। मैं इन सभी पहलुओं पर चर्चा करना चाहूँगा। सर्व प्रथम धर्म की, हमारे देश में जितने प्रकार के धर्म, मजहब,जातियां, संप्रदाय हैं इतनी किसी अन्य देश में नहीं इस कारण लोगों को जोड़ कर "रखना एंव रहना" कितना मुश्किल है यह आपको 'रहने' वाला माध्यम वर्ग का आदमी या 'रखने' वाला राजनीतिज्ञ(नेता) से बेहतर कोई और नहीं बता सकता।
बात करते हैं भूगोल की, पूरब में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में रेगिस्तान, उत्तर में हिमालय की बर्फीली वादियां और दक्षिण में महासागर। दुनिया में मौजूद हर प्रकार की कुदरती खूबसूरती हमारे देश में विराजमान हैं। रही बात भाषा की तो भारत को दुनिया की सबसे प्राचीन ,वैज्ञानिक संगत, यांत्रिक(computer) के लिए सबसे उचित भाषा संस्कृत की जाननि के तौर पर जाना जाता है। संस्कृत से ही निकली हिंदी यहाँ के तीन चौथाई (3/4)लोगो की भाषा है, साथ ही ऐसे क्षेत्र भी मौजूद हैं जहाँ हर 10 की.मी. पर भाषाओ को बोलने का ढंग बदल जाता है। शायद भारत की विविधता का ही कमाल है के पुरे विश्व ने हमें इतना प्यार, सम्मान दिया।
भारत में अनेक प्रकार की बोलिया बोली जाती है।
* यहाँ जब बात राजनीती की आती है तो आदमी हिंदी में बोलता है, राजनीती बोलता है,चुनाव बोलता है,विकास बोलता है,आरक्षण बोलता है इत्यादि।
* यहाँ बात जब अर्थशास्त्र (इकोनॉमिक्स) की आती है तो अंग्रेजी में बोलता है, जी.डी.पी बोलता है,एफ्फीडवित बोलता है, सेंसेक्स बोलता है इत्यादि।
* पर जब यहाँ बात प्यार की आती है मित्रों तो आदमी उर्दू में बोलता है, इश्क़ बोलता है,इजहार बोलता है, इकरार बोलता है,इनकार बोलता है, तकरार बोलता है।
कुछ लोग अब कहेंगे~ बड़ा पता है इन्हें प्यार मुहब्बत के बारे में। तो मैं उन लोगो से गुज़ारिश करूँगा के बहुत ज़यदा तो नहीं पर थोड़ी बहुत ऑब्जरवेशन है जो मैं आपसे बाँट रहा हूँ।
अब आते हैं असल मुद्दे पर। 14 सितंबर यानी- हिंदी दिवस। पुरे देश में इस दिन हिंदी दिवस की गूँज ऊंचे ऊंचे मंचों से सुनाई पड़ी। पर कहीं न कहीं इसी गूँज के साथ ही सुनाई देती है हिंदी की वो सिसकती हुई, कराहती हुई आवाज जो देश के आज़ाद होने के बाद से ही ज़ारी है।
इतने बड़ी आबादी की भाषा होने के बावजूद हिंदी के संगरक्षण की बात क्यू की जाती है। ऐसा प्रतीत होता है मानों कोई भाषा नहीं बल्कि कोई विलुप्त होता जानवर हो।
हिंदी को दरकिनार कर उसकी जगह लेने का काम अंग्रेजी की जड़ों ने किया जो अंग्रेजों के आने के बाद से ही हमारे समाज में फैलना शुरू हो गई। ग़ुलामी के दिनों में अंग्रेजी कामगुज़ारी के तौर पर इस्तेमाल की जाती थी पर धीरे-धीरे यह (status symbol) के तौर पर इस्तेमाल की जाने लगी। हमारे देश में चेतन भगत जैसे मानसिकता वालों की भी कमी नहीं है जो हिंदी में बनी फिल्मों के द्वारा लोकप्रियता हासिल करते हैं और हिंदी को ही मटियामलेट करने पर आमादा होते हैं, इनका कहना है के हिंदी को हिंदी-अंग्रेजी के मिश्रण यानि हिंगलिश के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। भईया खिचड़ी तो बीमार होने पर ही खायी जाती है और हम बीमार नहीं है। कुछ लोग इसे विकास(development) की भाषा बताते हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ। क्या जिन देशों में अंग्रेजी नहीं बोली जाती जैसे रूस, जर्मनी, चीन, जापान उनमें विकास नहीं हुआ? ज़रूर हुआ और अंग्रेजी प्रधान मुल्कों से अधिक और तीव्र हुआ। कोरिया को ही ले लीजिये छोटा सा है मगर अमेरिका को हिंकता रहता है।
भारत एक विविधता (diversity) पूर्ण देश है, चाहे बात धर्म की हो या भूगोल की या बात हो भाषाओँ की। मैं इन सभी पहलुओं पर चर्चा करना चाहूँगा। सर्व प्रथम धर्म की, हमारे देश में जितने प्रकार के धर्म, मजहब,जातियां, संप्रदाय हैं इतनी किसी अन्य देश में नहीं इस कारण लोगों को जोड़ कर "रखना एंव रहना" कितना मुश्किल है यह आपको 'रहने' वाला माध्यम वर्ग का आदमी या 'रखने' वाला राजनीतिज्ञ(नेता) से बेहतर कोई और नहीं बता सकता।
बात करते हैं भूगोल की, पूरब में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में रेगिस्तान, उत्तर में हिमालय की बर्फीली वादियां और दक्षिण में महासागर। दुनिया में मौजूद हर प्रकार की कुदरती खूबसूरती हमारे देश में विराजमान हैं। रही बात भाषा की तो भारत को दुनिया की सबसे प्राचीन ,वैज्ञानिक संगत, यांत्रिक(computer) के लिए सबसे उचित भाषा संस्कृत की जाननि के तौर पर जाना जाता है। संस्कृत से ही निकली हिंदी यहाँ के तीन चौथाई (3/4)लोगो की भाषा है, साथ ही ऐसे क्षेत्र भी मौजूद हैं जहाँ हर 10 की.मी. पर भाषाओ को बोलने का ढंग बदल जाता है। शायद भारत की विविधता का ही कमाल है के पुरे विश्व ने हमें इतना प्यार, सम्मान दिया।
भारत में अनेक प्रकार की बोलिया बोली जाती है।
* यहाँ जब बात राजनीती की आती है तो आदमी हिंदी में बोलता है, राजनीती बोलता है,चुनाव बोलता है,विकास बोलता है,आरक्षण बोलता है इत्यादि।
* यहाँ बात जब अर्थशास्त्र (इकोनॉमिक्स) की आती है तो अंग्रेजी में बोलता है, जी.डी.पी बोलता है,एफ्फीडवित बोलता है, सेंसेक्स बोलता है इत्यादि।
* पर जब यहाँ बात प्यार की आती है मित्रों तो आदमी उर्दू में बोलता है, इश्क़ बोलता है,इजहार बोलता है, इकरार बोलता है,इनकार बोलता है, तकरार बोलता है।
कुछ लोग अब कहेंगे~ बड़ा पता है इन्हें प्यार मुहब्बत के बारे में। तो मैं उन लोगो से गुज़ारिश करूँगा के बहुत ज़यदा तो नहीं पर थोड़ी बहुत ऑब्जरवेशन है जो मैं आपसे बाँट रहा हूँ।
अब आते हैं असल मुद्दे पर। 14 सितंबर यानी- हिंदी दिवस। पुरे देश में इस दिन हिंदी दिवस की गूँज ऊंचे ऊंचे मंचों से सुनाई पड़ी। पर कहीं न कहीं इसी गूँज के साथ ही सुनाई देती है हिंदी की वो सिसकती हुई, कराहती हुई आवाज जो देश के आज़ाद होने के बाद से ही ज़ारी है।
इतने बड़ी आबादी की भाषा होने के बावजूद हिंदी के संगरक्षण की बात क्यू की जाती है। ऐसा प्रतीत होता है मानों कोई भाषा नहीं बल्कि कोई विलुप्त होता जानवर हो।
हिंदी को दरकिनार कर उसकी जगह लेने का काम अंग्रेजी की जड़ों ने किया जो अंग्रेजों के आने के बाद से ही हमारे समाज में फैलना शुरू हो गई। ग़ुलामी के दिनों में अंग्रेजी कामगुज़ारी के तौर पर इस्तेमाल की जाती थी पर धीरे-धीरे यह (status symbol) के तौर पर इस्तेमाल की जाने लगी। हमारे देश में चेतन भगत जैसे मानसिकता वालों की भी कमी नहीं है जो हिंदी में बनी फिल्मों के द्वारा लोकप्रियता हासिल करते हैं और हिंदी को ही मटियामलेट करने पर आमादा होते हैं, इनका कहना है के हिंदी को हिंदी-अंग्रेजी के मिश्रण यानि हिंगलिश के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। भईया खिचड़ी तो बीमार होने पर ही खायी जाती है और हम बीमार नहीं है। कुछ लोग इसे विकास(development) की भाषा बताते हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ। क्या जिन देशों में अंग्रेजी नहीं बोली जाती जैसे रूस, जर्मनी, चीन, जापान उनमें विकास नहीं हुआ? ज़रूर हुआ और अंग्रेजी प्रधान मुल्कों से अधिक और तीव्र हुआ। कोरिया को ही ले लीजिये छोटा सा है मगर अमेरिका को हिंकता रहता है।
भारत में जब बच्चा जन्म लेता है तब सबसे पहले उसके कानो में हिंदी सुनाई देती है (t&c apply)। पर शिक्षा जगत में आते ही बच्चे के ऊपर बड़े ही सुनियोजित तरीके से अनजाने में ही सही पर अंग्रेजी को मॉडर्न, फैशनेबुल, डेवलप्ड बोल कर इसकी चादर चढ़ाई जाती है। अंग्रेजी का आधिपत्य शुरू होता है स्कूलों से जहाँ न चाहते हुए भी विद्यार्थियों को अंग्रेजी सीखनी पड़ती है या सिख दी जाती है। उदहारण के तौर पर पंजाब में बुलेट( दो पहिया वाहन) का बड़ा शौक है। यहाँ बच्चे से लेकर बुड्ढों को भी इस वाहन को चलने का खुमार होता है। यह सिर्फ पंजाब में ही नहीं बल्कि कई राज्यों की बात है।ग़ुलामी के दिनों में बुलेट अँगरेज़ अधिकारीयों द्वारा इस्तेमाल की जाती थी और अँगरेज़ इसे अपनी सहूलियत के कारण इस्तेमाल करते थे क्योंकि बुलेट को बनाने वाली कंपनी (रॉयल इंगफील्ड) ब्रिटेन की कैम्पनी है और उन्हें सस्ते दामों पर उपलब्ध
हो जाती थी इससे उनका पैसा उनके देश में ही रह जाता और उनके देश का विकास होता न के बुलेट चलाने पर वे बड़ा आनन्दित , गर्वान्दित महसूस करते थे जैसा के आज हमारे भारतीय करते हैं। यह हमारी मानसिक गुलामी को ही दर्शाता है के हम अंग्रेजों की सहूलियत की चीज़ को अपने गर्व करने का साधन बना फिरते हैं। ऐसे अनेक उदहारण हमारे समाज में मवजूद हैं।हमारे देश में होते विकास और बदलते समय की मांग है की हम वक़्त को समझ उसके अनुरूप चलें। जहाँ एक तरफ भारत को अपनी विविधताओं, आध्यात्म, ऐतिहासिक धरोहरों जैसी अलग पहचान के रूप में देखा जाता हैं वहीँ अगर भारत को पश्चिमी अंधानुकरण की मानसिक गुलामी से आज़ाद करा अपनी अलग बोली को विस्तृत किया जाये तो भारत को विश्व गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता।
भाषा देश की आत्मा होती है। किसी भी देश को ख़त्म करना हो तो उसकी संस्कृति को खत्म कर दो देश खुद-ब-खुद मर जायेगा। उदहारण के तौर पर अगर मुझे किसी कक्षा को खत्म करना हो तो मुझे क्या करना चाहिए? शिक्षक को हटा दूँ? इससे क्या होगा नए शिक्षक आ जायेंगे। क्या मैं विद्यार्थियों को हटा दूँ? कोई फायदा नहीं दूसरे विद्यार्थी आ जायेंगे। मगर तब क्या होगा जब मैं उस विषय को ही समाप्त कर दूँ जिसे कक्षा में पढ़ाया जाता है? तब न कोई शिक्षक आएगा न विद्यार्थी। यही हाल होगा उस देश का जिसकी संस्कृति मरेगी।
हिंदी भारत की संस्कृति का हिस्सा है और संस्कृति देश की आत्मा होती है। विश्व में अलग-अलग भाषा होने के कारण हर एक भाषा की अपनी ही शक्ति है। विश्व में भाषा की कूटनीति का खूब इस्तेमाल किया जाता है। भाषा की कूटनीति कितनी महत्वपूर्ण है इस बात का अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते है की फ्रांस में पहुचे हमारे प्रधानमंत्री और उनके सलाहकारों से वहाँ के अधिकारी अंग्रेजी जानते हुए भी फ्रेंच भाषा बोलने को प्रतिबद्ध किया। यह अन्य देशों की भी कहानी है।
अपनी भाषा को विश्व स्तर पे पहुचाने की बात हो तो स्वामी विवेकानंद,अटल बिहारी बाचपेइ का UN में भाषण भी हिंदी में रहा। पर पासा अब पलट चुका है हमारे देश में बनी भाजपा सर्कार के अधिकतर मंत्री विदेशों में जाने पर हिंदी में वार्ता करते हैं। इससे विदेशियों पर कूटनीतिक दबाव बनाने और अपना वर्चस्व बढ़ने में आसानी होती है।
हमारे देश में होते विकास और बदलते समय की मांग है की हम वक़्त को समझ उसके अनुरूप चलें। जहाँ एक तरफ भारत आज मंगल यान, परमाणु क्षेत्र, वैज्ञानिक क्षेत्र, आध्यात्मिक क्षेत्र में बहुत गति से आगे बढ़ रहा वहीँ अगर भारत को पश्चिमी अंधानुकरण की मानसिक गुलामी से आज़ाद करा अपनी अलग बोली को विस्तृत किया जाये तो भारत को विश्व गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता।
कहते हैं देश का भविष्य युवा के करते हैं। तो अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है के हम अपने देश को स्वयं को कहा देखना चाहते हैं। चंद सिक्कों की नौकरी चाहिए या देश की उन्नती।

aise vichaaron ki aaj k yuvavarg ko aavashakta hain.
ReplyDeleteधन्यवाद आचार्या ।।
ReplyDeleteThanks for incresing potential of Hindi.Hindi is our national language.We have capacity to increase the value of hindi.For development of any country need one language that every person can speak and understand.Hindi is our traditional language.so, Thank for described value of hindi.
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