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वसुधैव कुटुम्बकम

जब भी कभी किसी रूढ़िवादी धारा में आविष्कार होता है तो पिछले सभी आविष्कार धाराशाही हो गिर पड़ते हैं। परंतु जिस विचारधारा (सिद्धांत) की चर्चा का विस्तार हो रहा वह नवीन नहीं। मात्र इस आधुनिक युग के मान्यताप्राप्त नवीन मिथ्या विचारधाराओं पर सत्य की पुनरुक्ति है।
"हर सिक्के के दो पहलु होते हैं", "कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है"◆
एक समय था जब दुनिया इस धरा को चौकोर मानती थी आधुनिक यंत्रों के सटीक आंकलन ने इस तथ्य को धराशाही कर पृथ्वी के गोल होने का प्रमाण दिया।
समय ऐसा भी था जब दुनिया सूर्य को पृथ्वी का दीवाना बताती थी परंतु आधुनिक यंत्रों ने इसे भी बेबुनियाद ठहराया।
इसी प्रकार जब आज इस आधुनिक युग में हम भारतीय संस्कृती के प्राचीन सार्वभौमिक सिद्धान्त  "वसुधैव कुटुम्बकम" अर्थात (समूचा विश्व एक परिवार है) अपनाते हैं तो ढेरों नियम, कायदे, सिद्धांत धराशाही हो पड़ते हैं। जिनमे स्वयं भारत की कोख से जन्मे सार्वभौमिक नियम, सिद्धांत भी आते हैं।
जिनमें महात्मा गाँधी के स्वदेशी , दादा भाई नाओर्जि के इकनोमिक ड्रेन , किसी  भी राज्य की अस्मिता जैसे कायदे शीर्ष पर आते हैं।
समुचित विश्व को एक परिवार मानना अपने अंतर्गत एक विशाल, विकसित, प्रगतिशील सोच है।
जहाँ एकल किसी राज्य की भलाई की नही बल्कि समूचे विश्व की भलाई, समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था, शांति और प्रगति का ध्यान करना होगा
●अन्यथा भारत सा ग़ुलाम होगा संसार
भारतीय इतिहास को तीन भागों में विभाजित किया गया है। प्राचीन, मध्यकालीन तथा आधुनिक।
इन तीनों भागों में मात्र "प्राचीन युग" को छोड़ दोनों युगों में ग़ुलामी की जंज़ीरों के भार से पन्नें क्षुब्ध हैं। भारत के ग़ुलाम होने के अनेक कारण हैं जिनमे मूल कारण दूरदर्शिता का मिलता है।
अपने तक सिमटना, अहंकार में मग्न, पुराने युद्ध कौशल, आपसी तालमेल का आभाव अन्य...।।
इन्ही कुछ कारणों ने भारत को  करीब १२०० वर्षों तक शारीरिक ग़ुलाम बना रखा। मानसिक स्वतन्त्रता तो आज भी बीहड़ में तालाब है।
जिस प्रकार भारतीय राजाओं द्वारा विदेशी आक्रांताओं की अनदेखी करने, स्वयं का महिमामंडन करने का फल पूरे भारत वर्ष से भोगवाया है। ठीक उसी प्रकार वसुधैव कुटुंब के सिद्धांत की अनदेखी करने फल समुचित विश्व ग़ुलाम हो भोगेगा।
●धुंआ तभी उठता है जब कहीं आग लगी हो●
यह हमारा दुर्भाग्य है जो आज युवा पीढ़ी में सबसे लोकप्रिय शिक्षक, शिक्षण संस्थान 'सिनेमा' बन बैठा
है। कक्षा से निकलने के उपरांत गिने चुने छात्र होंगे जिन्हें कक्षा में पढ़ा याद हो परंतु सिनेमा हॉल से निकले प्रत्येक दर्शक को फ़िल्म के डायलॉग्स ऐसे याद होते हैं मानो उनका अपना सृजन। न सिर्फ उन्हें डायलॉग्स याद होते है किन्तु वो उन्हें अपने जीवन में उपयोग भी करते हैं । सलमान के प्रचलित डायलॉग आई, मी और माइसेल्फ (i, me and myself) वाले डायलॉग के प्रचलित होने के मूल में समाज में तेरा- मेरा अर्थात अलगाव की भवना का ही बाहुल्य है। बहुतायत युवा के आदर्श आइंस्टीन, महात्मा गांधी, चे ग्वेरा न होकर सलमान, कटरीना , लिओ नार्डो जैसे व्यक्ति होते हैं।
परन्तु हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जहाँ इस सिनेमा के दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं वहीँ इसके शुभ परिणाम भी हैं। जागरूकता, ज्ञान अन्य....।
सो फिल्मों में यूँ ही नहीं एलियन्स (दूसरे ग्रह से आये प्राणी) को दिखाया जाता है। आये दिन मीडिया में किसी उड़न तश्तरी दिखाई पड़ने की ख़बरें हमने पढ़ी।
बड़े बड़े वैज्ञानिक, बड़े बड़े शोध कार्यों द्वारा इस अनसुलझे रहस्य को सुलझाने का प्रयास निरंतर कर रहे हैं। मुझे डर है कोई नास्तिक जैसा प्राणी सुबूतों के आभाव में इस तथ्य पर अपने संकुचित बाण न चला दे।
पृथ्वी एक मात्र गृह नहीं जहाँ मनुष्य नामक स्यंभू प्राणी बसे●
जो भी हो परंतु जहाँ अरबों तारों , सूर्यों की अरबों आकाश गंगा हो। जहाँ आँखों से दिखने वाले तारों का ज्ञान नहीं वहां न दिखने वाली वस्तुओं पर ज्ञान का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके बावजूद इस विशाल अनदेखे ब्रह्माण्ड में मात्र एक धरती ही है जहाँ प्राणियों का वास है मान लेना बेवकूफी होगी।
न जाने कब कौन बाह्य प्राणी आक्रमण कर पूरी पृथ्वी को ग़ुलाब बना दे या नष्ट कर दे इसका आश्वासन कोई न दे सकता। हो सकता है वो मित्र के रूप में आगमन करे। मगर ध्यान रहे, मैंने "सकता" है कहा।
सो इस धरा को आपस में लड़ लड़ कर बर्बाद के बजाय गर हम एकता, भाईचारे, जन कल्याण, या यूँ कहे तो सबका साथ सबका विकास ( मैं भक्त नहीं) की विचारधारा को आत्मसात करें तो इन संकटों के दौरान पछतावा नाम की भावना से बच सकते हैं।
आतंकवाद नाम की लाइलाज बिमारी का इलाज●
आज के दौर में समूचा विश्व में प्रत्येक राज्य आतंकवाद नाम के सर्प का दंश झेल रहा है। आतंकवाद के कारणों को टटोले तो हमारे हाथ दो सिक्कों के रूप में जो कारन सामने आएंगे वो हैं धार्मिक और दूसरा राजनैतिक।
पाकिस्तान को पटवारियाना, कश्मीर की कैद, खालिस्तान की ख्वाहिश, बांग्लादेश का बेगानापन, अरुणाचल का संगरक्षण इन सभी कृत्यों ने अनगिनत मासूमों की जाने ली हैं और न जाने कब तक लेती रहेंगी।
असल में द्वन्द सदैव दो असामान्य वस्तुओं में होता है जहाँ अलगाव है। तेरा- मेरा की भावना है। बस वहीँ द्वन्द है। टकराव है। लड़ाई है।
यह राजनैतिक चालबाजियां ही हैं जिनकी बदौलत आज मनुष्य ने इस धरा पर न दिखने वाली राजनैतिक दीवारे खड़ी कर दीं हैं। जब बनाने वाले ने फर्क न किया तो हम कौन होते हैं फर्क पैदा करने वाले। परन्तु कुछ लोगों को भिन्न दिखने की तलब "खतने" पर आ खत्म होती है।
ज्यों ही हम इन मनुष्यों की बनाई राजनैतिक धार्मिक दीवारों को गिराते हैं त्यों ही हमें सम्पूर्ण विश्व एक धागे में पिरोया प्रतीत होता है। वसुधैव कुटुंब प्रतीत होता है। न कोई रंजिश, न कोई जमीनी मोह, न कोई आतंकवाद। बचती है तो मात्र शांति, सद्भावना और प्रेम ।।

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