जिंदगी में कई दफ़ा ऐसा होता है जब इंसान अपने जिंदगी को नए सिरे से शुरू करना चाहता है। दुनिया दूसरा मौका देती है। इसी वाक्य की धार ने इस कहाँनी के धुंधलेपन को चीरा है।
यह कहानी है उत्तर प्रदेश के छोटे से जिले गोरखपुर के एक ऐसे युवक की जिसने व्यक्तिगत तौर पर अभी जीना शुरू किया है। परंतु उसकी दुनिया अलग है। बाहरी दुनिया से अनभिज्ञ। बमुश्किल घर की चार दीवारियों से बाहर जाने की इजाज़त मिलती। गाँव के चौराहेे तक जाना भी उसके लिए किसी अजूबे को देखने से कम न था। आकाश ९वीं का छात्र है। मिन्नतों बाद उसके घर वालों ने उसे स्कूल बस छोड़ साइकिल से स्कूल जाने का आशीर्वाद दिया। स्वतंत्रता का जो रस उसने अपने जीवन के १६ वर्षों में न पिया था वह रस अब उसके जिव्हा पर दस्तक देने लगा था। आकाश के पिता एक संघरशील व्यक्ति हैं। जिन्होंने बड़ी ही कठिनाइयों के साथ एक मक़ाम हासिल किया था। कुछ ऐसी ही संघर्ष प्रवित्ति, कुछ कर गुजरने की ललक वे आकाश में भी देखना चाहते थे जो उन्होंने उसे बचपन से ही अपने प्रेरणादायी विचारों से सान रखा था। पर उससे पढाई न होती।
घर से विद्यालय को निकलते ही वह किसी ताज़े आज़ाद परिंदे की तरह नाचने लगता। सपनों के द्रव्य से दुनिया को सींचता। ह्रदय के कैमरे से कुँवारे जगत के चित्र बनाता। पर इस कलयुग में सीधे पेड़ जल्दी काट दिए जाते हैं। पारिवारिक लाड प्यार से निकल सीधा सामाजिक गतिविधियों में लिप्त होना उसके लिए किसी चक्रव्यूह से कम न था। धीरे धीरे इस दुनिया ने उसके मन में वैर धारण कर लिया। उसने जाना जिन उचाईयों को छूने की कोशिश वह कर रहा था वह गहरी खाइयों में तब्दील हो चुकी हैं। नादानी, भोलापन, भावनात्मकता ही उसके असल वस्त्र थे।
छुट्टी में विद्यालय से घर आते ही किसी बहाने वह कुछ मित्रों के साथ खेलने निकल पड़ता। उन जगहों पर जहाँ कभी बस से आते समय वह दूसरों को खेलता देख हर्षित होता था। एक ऐसा खेल खेलने जो उसने मात्र खयालों में ही खेला था। इससे पहले के वह खेल में पारंगत हो पाता बच्चों ने उसकी खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी।
अक्सर कक्षा में अध्यापकों द्वारा दिए गृह कार्यों को न पूरा कर पाने पर बुरी तरह प्रताड़ित होता। मित्र मंडलियों में स्वयं को दूसरों के आक्रामक रवैये से बचा पाना उसके बस की बात न थी। घर से निकलते ही वह हंसी का पात्र बन जाता।
इन कृत्यों ने उसे अपनी ही नज़रों में हीन कर दिया। संसार को प्रेम करने वाला हृदय द्वेष में परिवर्तित हो गया। परन्तु समय ने कहाँ एक सी चाल चली है।
आकाश के जीवन में नया मोड़ तब आया जब उसकी मित्रता अपने से वरिष्ठ छात्रों से हुई। कारण था, स्नेह।
जो प्रतिद्वंदियों संग मुश्किल था। एक रोज़ स्कूल के बाहर आकाश के मित्रों का जमवाड़ा लगा था। उसे बताया गया की वे किसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। थोड़े समय पश्चात ही वह लड़का अपने दो चार मित्रों के साथ आया। आकाश के मित्रों ने बिना किसी वार्तालाप के लड़के पर हमला कर दिया। पर आकाश का ध्यान उसके एक वरिष्ठ ने विशेष रूप से खिंचा जो कद में आकाश से भी छोटा था। वह अपने से बड़े लड़के की ज़ोरदार पिटाई कर रहा था। आकाश कद में छोटा था। जिसके कारण भी उसे काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ता था। ऐसे में अपने से छोटे व्यक्ति को दूसरे विशाल व्यक्ति पर पड़ता देख उसे प्रोत्साहनुभूति हुई।
लड़ाई के बीच में ही किसी की आवाज़ आयी। "आकाश, देखता क्या है ? मार उसे। और आकाश इस बात से अनजान उस वाक्य का पालन करने कूद पड़ा के यह कृत्य उसके जीवन के 4-5 सालों के निर्माता बन जाएंगे।
उसी रोज़ से यह मार-पिटाई का खेल रोज़ के
तमाशे में तब्दील हो गया। स्कूल के साथ साथ आस पास के स्कूलों, गाओं, मोहल्ले में आकाश कुख्यात हो गया। उत्तर प्रदेश में फैले आपराधिक आकाओं ने इस कृत्य में आग में घी झोंकने का काम किया। जो ऐसे युवकों की तलाश में ही रहते हैं जिनके काँधे बन्दूक चला सके। अब बात हाथ-पाँव चलने तक सिमित न थी बल्कि असलहों तक पहुँच चुकी थी। न सिर्फ चलाना बल्कि व्यापर भी करता। जिन लोगों द्वारा कभी उसका मजाक उड़ाया जाता वह मुह पर उसे स्नेह देने लगे। भला सम्मान प्राप्त करने से किसे आपत्ति होती है। आकाश को लगता के जीवन में सफलता की सीढ़ी कुकर्मों द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। वैचारिक, किताबी ज्ञान से ज़्यादा उसपर व्यवहारिक ज्ञान ने असर दिखाया था।
पर समय ने फिर पलटी मारी। इस घटना ने आकाश के नज़रिए को बदल कर रख दिया।
रोज़ की तरह कुछ गलत ना करने की कसमें खाकर आकाश जैसे तैसे स्कूल को निकला। स्कूल के बहार पहले से खड़े मित्रों ने उसे बताया की आज उन्होंने स्कूल न जाने का निश्चय किया है। कारण, एक मित्र की नयी खरीदी दुपहिया। आज उसका उद्घाटन करने जाना था। यह पहली बार नहीं था जब वे स्कूल की ड्रेस में ही स्कूल न जाकर कहीं घूमने निकल पड़े।
पांच दुपहियों पर तीन- तीन के हिसाब से बारह लोग लद पड़े। और निकल पड़े एक अनजान मंज़िल की ओर। पर किसी को पता न था के जाना कहाँ है। सभी ने अपनी इच्छा प्रकट की पर वीर ने कहा (जो आकाश के बचपन के मित्रों में से एक था...)
वीर- क्यों न आज किसी नए जगह पर चलें। इन जगहों से तो मन उबिया गया है। कुछ सोचते हुए उसने कहा... मगहर चलते हैं। बड़ी अच्छी जगह है। मैंने भी नहीं देखी वो जगह पर रास्ता पता है। सुना है वही संत कबीर मृत्यु को प्राप्त हुए थे। मंदिर है सो दुपहिया की पूजन भी हो जायेगी। और सभी निकल पड़े संत कबीर स्थली देखने। वाहनों की रफ़्तार बताने वाले कांटे अपने उच्चतम स्तर को छूती हुई मगहर पहुँची। वहाँ पहुच सभी ने शीश झुकाए। कुछ घंटों के भ्रमड के बाद अब वापसी का समय हो चला था। पुनः अपने वाहनों पर लद सभी निकल पड़े। कबीर स्थली से निकले ही थे की किसी मित्र की आवाज़ आयी । यह वीर था।
वीर- ज़रा ठहरो, यह देखो। कितना सुन्दर दृश्य है।
आमी नदी के किनारे पर बने एक पुल से होते हुए कुछ गुम्बद खड़े थे। जहाँ गाँव के दो दर्जन लोग नदी में छलांग लगा नहा रहे थे।
वीर - देखो यह लोग कैसे अपने पाप धुल रहे और हमारे पाप का घड़ा न जाने कब भर जाए। अब इतनी दूर आये हैं तो दो-चार डुबकी यहाँ भी लगाते चले।
अमन- पर मुझे तैरना नहीं आता। कइयों ने आपत्ति जताई।
वीर- चिल्लाना तो आता है? देखो यह गाव के बालक तैराकी में बड़े कुशल होते हैं। अगर कुछ होता भी है तो यह हमें बचा लेंगे।
वीर के यह शब्द सभी के मन में उठ रही शंकाओं की लहरों को शांत करने के लिए पर्याप्त थे। और सभी अपनी वाहनों को सड़क किनारे लगा चल दिए उस स्थल की ओर इस बात से अज्ञात के वह कोई पर्यटक स्थल न होकर एक शमशान घाट है। वीर ने पहले अपने कपडे उतारे और सीढ़ियों से होता हुआ पानी में प्रवेश कर गया। और उसके पीछे पीछे अमन भी। आकाश ने भी अपने कपडे उतारे पर उसे तैराकी न आती थी। कुछ विचारने के बाद उसने न जाने क्या सोच कर पुनः अपने वस्त्र पहन लिए। अमन ने जाते समय आकाश को अपना फ़ोन पकड़ा वीडियो बनाने को कहा। जिसे लेकर वह पानी से बाहर कृत्यों को दृश्या रहा था। वीर और अमन को डुबकियाँ लगाता देख कुछ समय पश्चात दो और लड़कों राजेश और पवन ने पानी में प्रवेश किया। पर वे ज़्यादा दूर न जाकर कुछ एक समय में वापस हो लिए। वीडियो बनता देख अमन पानी में कलाबाजियां दिखने लगा। और न जाने कब देखते ही देखते अमन और वीर किनारे से काफ़ी दूर हो गए। अब उन्हें तैराकी में असहजता महसूस होने लगी। आकाश पानी के बाहर खड़े वीडियो बनाये जा रहा था कि तभी एक चीख़ सुनाई पड़ी। "बचाओ"।।
यह वीर था। जिसके साथ ही अमन भी आकाश को देख सहायता की गुहार लगाने लगा। आकाश ने अपने आस पास मौजूद लोगों से सहायता मांगने को मुड़ा तो उसने देखा के जिन गाँव के लोगों के भरोसे उसके मित्रों ने पानी में जाने का निर्णय किया था वे अपने वस्त्र समेट भाग रहे थे। यहाँ तक की उसके अपने मित्र भी उस भीड़ में शामिल हो गए। आकाश तैरना न जानने के कारण असहाय था। वह चाह कर भी अपने मित्रों की मदद नहीं कर सकता था। मित्र को मौत के मुँह में जाता दृश्य ने उसे अत्यंत स्वार्थी बना दिया था। भागती भीड़ में से एक वयस्क प्रतीत होते युवक को आकाश ने दबोचकर पूछा।
आकाश- तैरना आता है?
युवक- (घबरा कर) आता है।
यह सुनते ही अमन और वीर को बचाने हेतु आकाश ने युवक को पानी में फेंक दिया। करता भी क्या जब अपने ही भाग खड़े हुए। जो आकाश के एक इशारे पर कुछ भी कर देते। न दिन को दिन देखते न रात को रात। बस हाज़िर हो जाते। जिनके विश्वास पर आकाश अपना भविष्य देखता था।
अमन और वीर लगातार आकाश की ओर देखते हुए मदद की गुहार लगाए जा रहे थे। युवक ने वीर की कलाई पकड़ी और धकेलते हुए किनारे पर ले आया। आकाश ने वीर को पानी से बाहर निकाला। और अमन को बचाने के लिए अपना कमरबंद निकाला। परन्तु अमन तक पहुचने के लिए कमरबंद की लंबाई नाकाफी थी। वीर को कुछ देर पानी उगलने के पश्चात् हवास की प्राप्ति हुई। और होते ही वह अपना स्कूली बस्ता और कपडे समेट अपनी वाहनों की ओर भागा। वीर के साथ ही उसका जीवनदाता भी भाग निकला। अब घाट पर अमन और आकाश को छोड़ और कोई नहीं था।
अमन को अब गंगा मईया की सात अंतिम चेतावनियाँ ग्रास हो रही थीं। मान्यतानुसार जो वह हर डूबते व्यक्ति को देतीं हैं। आकाश विवश होकर सहायता हेतु अपने मित्रों के पास सड़क की ओर भागा। जहाँ उनकी दुपहिए खड़ी थीं। सड़क पर पहुच उसने देखा उसके मित्र दुपहियों को चालू कर उसे वहीँ छोड़ निकलने को तैय्यार थे। यह देख आकाश उनकी ओर लपक कर उनके दुपाहियों से चाभियाँ निकाल लीं।
आकाश- क***$$ तुम अपने दोस्त को मरता छोड़ भाग रहे हो। अब जाओ जहाँ जाना है।
यह कहते हुए उसने एक दुपहिया चालू कर गांव की ओर सहायता हेतु निकला। रस्ते में मिले पहले व्यक्ति को उसने स्थिति समझा सहायता मांगी। पर तैरना न जानने के कारण व्यक्ति ने मना कर दिया साथ ही उसने कहा।
राहगीर- आप सामने की गली में तीसरे मकान पर चले जाओ वहाँ एक धीवर रहता है। वह आपकी मदद अवश्य करेगा।
आकाश कुछ ही क्षणों में धीवर के दर पर था उसने देखा। एक अधेड़ पुरुष मछली का जाल बुनने में व्यस्त था। उसने स्थिति समझते हुए सहायता मांगी।
धीवर- बेटा, देखत हौ इ जाल बुनत है। कइसे छोड़ चलीं?
आकाश ने अपनी ज़ेब में पड़ी कोचिंग की फीस निकाल धीवर के चरणों में रख कहा....बाबा, मैं हाथ जोड़ता हूँ। मेरे दोस्त को बचा लो। धीवर मान गया। और पलक झपकते ही आकाश धीवर को ले घटनास्थल पर पहुँच गया। परन्तु अब पानी में अब कोई न दिख रहा था।
धीवर- कौन डूब रहा है? कहाँ है तुहरा दोस्त?
आकाश- ( रोते हुए) यहीं था बाबा। ठीक इसी जगह पर। उसे बचा लो बाबा।
आकाश ने धीवर को पानी में गोता लगाने को कहा। परंतु धीवर ने अँधेरे में तीर चलाना ठीक न समझा। धीवर ने विलम्ब न करते हुए दूसरी ओर गश्त करते हुई एक नौका को पुकारने लगा। नाविक घटना स्थल पर पहुँच अपने चप्पू को आकाश के निर्देशानुसार नदी की गहराईयों में घुमाने लगा। तभी कोई ठोस वस्तु चप्पू पर आकर लगी। नाविक ने जोर लगा उसे बाहर निकाला। वह अमन का पैर था। अमन का एक पैर हवा में लहराया। आकाश इस भयावह दृश्य को देख बदहवास हो गया। अश्रु की धारा लगातार उसके आँखों से फूट रही थी। बड़ी मशक्कत के उपरांत अमन को पानी से बहार निकाल लिया गया। तब तक शमशान घाट के चारो तरफ गाँव के व्यस्क, बुज़ुर्गों का जमावड़ा लग चुका था। चार पांच लोग अमन को पानी से निकल सड़क पर ले आए। और ज़मीन पर रख कर दूर खड़े देखने लगे। आकाश रोते हुए अमन की छाती को दबा कर पानी निकलने लगा। हर एक दबाव के साथ अमन के मुँह और नाक से पानी भर भर कर बाहर निकल रहा था। आकाश ने महसूस किया उसके सिवा वहाँ कोई भी व्यक्ति अमन को हाथ लगाने को तैयार न था। एक बुज़ुर्ग ने बोला बेटा शरीर अभी गर्म है इसे जल्द से जल्द अस्पताल ले जाओ शायद जान बच जाए।
तभी पीछे से वीर ने आवाज़ दी।
वीर- भाई, इसे अस्पताल ले चलने के लिए कोई गाडी लानी होगी। तुम चाभी दो तो हम शीघ्र किसी गाडी को ले आए।
आकाश ने चाभियों का गुच्छा वीर को थमा दिया। थोड़ी देर में एक ऑटो लेकर वीर आया। और अमन को ऑटो में रख बाकी के सभी मित्र फरार हो गए। सिवाय पवन के। जिसे आकाश ने भागने न दिया। अब बात आई अमन को कौन से अस्पताल ले जाएं। अपने निवास स्थान गोरखपुर की ओर ले जाते तो अधिक विलम्ब होता तो उन्होंने ने नज़दीकी शहर खालीलाबाद जाने का निर्णय किया। रस्ते में आकाश ने अमन को बचाने का हर संभव प्रयास किया। कभी उसके मुँह में मुँह लगा कर पानी खींचता। कभी छाती दबाकर। भगवान से प्रार्थना करता।
लगभग पंद्रह मिनट के रास्ते के बाद अस्पताल पहुंचे। अमन को ऑटो से निकाल स्ट्रेचर पर लिटाते वक्त कहीं आकाश की उँगलियों पर खरोंच आ गई और खून निकलने लगा। पानी से भर चुके शरीर को उठाना दो लोगों के लिए मुश्किल हो रहा था। स्ट्रेचर से लेकर अमन को अस्पताल के अंदर ले जाया गया। अस्पताल में प्रवेश करते ही आकाश चिल्लाकर डॉक्टर -डॉक्टर पुकारने लगा। कहीं से भागते हुए गले में आला लगाये एक व्यक्ति दौड़ कर आया और अपनी जेब से एक टॉर्च निकाला और अमन की बंद आँखों को खोल पुतलियों पर रौशनी डालने लगा। आकाश जानता था डॉक्टर क्या कर रहा है। शरीर में जान हो तो आँखों पर रौशनी डालने से पुतलियाँ सिकुड़ती हैं। पर अमन की पुतलियों ने की हरकत न की। सो डॉक्टर के कुछ कहने से पहले ही आकाश ने बची कुची उम्मीद भी छोड़ दी और अपना सिर पकड़ वहीँ दिवार के सहारे ज़मीन पर बैठ गया। आकाश का दिमाग बंद सा हो गया था। वह इस घटना से बुरी तरह सहम गया था। पहली बार बिना बताए घर से इतनी दूर अकेले निकलना। स्कूल जाने के बजाए घुमने निकलना। जीवन में पहली बार किसी की मृत्यु अपनी आँखों से देखना। ऊपर से वह अपने ख़ास मित्र की। जिगरी कहलाने वाले यारों ने भी साथ छोड़ दिया और सामने पड़ी लाश। आकाश की समझ अब बंद हो चुकी थी। क्या करे क्या न करे। कुछ समझ नहीं आ रहा था। अमन पानी में प्रवेश करते समय वस्त्र उतार कर पानी में गया था। अस्पताल लाते वक़्त मात्र उसकेे जांघिये के ऊपर स्कूल की पैंट पहनाई गयी थी। ऊपरी शरीर को ढकने के लिए आकाश ने एक कर्मचारी से कफ़न मांग अमन को ढका। शरीर पार्थिव हो जाने के कारण कफ़न को सर के नीचे दबाने में कठिनाई हो रही थी। लाश को वहीँ अस्पताल के बाहर रख दिया गया।
कुछ देर बाद ही अस्पताल पर मीडिया और पुलिस वालों ने आकाश और पवन को घेर लिया। और तीख़े सवालों की बौछार कर दी। पवन जो लगभग बेहोश था। आकाश के हाथों में लगी खरोंच को हाथापाई का नाम दिया जाने लगा। और अगली सुबह के हर अखबार की सुर्खियाँ बनी मगहर काँड़ । अमन की माँ जो आकाश के कुकर्मो से वाकिफ थी उसने आकाश पर हत्या का आरोप लगा केस किया। और ऐसे अंत हुआ आकाश की भटकी राह का। जो काम आकाश ने अपने पिता, अध्यापकों के कहने पर न छोड़ा वह उससे प्रकृति ने छुड़वाया। इस घटना ने आकाश के मनो-मस्तिष्क को बुरी तरह झकझोर दिया था। घटना के बाद दो महीनों तक आकाश घर से बहार न निकला। परंतू परिवार के सहयोग से वह घर से पुनः निकला। पर इस बार किसी कसम के साथ नहीं बल्कि दृढ संकल्प के साथ। होता भी क्यों ना? भगवान् की लाठी ने बड़े बड़ों को सुधारा है। आवश्यकता बस इतनी है कि जो कार्य ठोकर लगने के सही हों उन्हें पूर्वज्ञान से सुधार लिया जाए तो बेहतर है। भारत में ऐसे अनेकों उदहारण मिलेंगे जो किसी परिस्थति वश गलत रास्ता चुनते हैं। जिसके उपचार को मात्र समाज में स्नेह, प्रेम देने की और आलोचनात्मक प्रवित्ति को आवश्यकतानुसार देने की।
हृदय को स्पर्श करती ये कहानी।
ReplyDeleteअपने कहे जाने वाले कई बार अपने नहीं होते।