भारत की भूमी ने सदैव धर्म का पाठ पढ़ाया है और धर्म ने प्रकृति प्रेम। प्रकृति अर्थात पेड़-पौधे, पशु सब। अब भारत जैसे देश में पशुओं पर अत्याचार जैसी लहरें उठें और विवाद न हो? असंभव!
जल्लीकट्टू में सांडों, प्रतिभागियों को लगने वाले घाव से सुरक्षा हेतु जल्लीकट्टू समर्थन में उतरे दर्जनों प्रदर्शनकारियों को लाठी चार्ज कर सरकारी खेमे ने सरकारी अस्पताल पंहुचा दिया।
संभवतः लाठी चार्ज पर भी पाबन्दी लगा देनी चाहिए।
सामाजिक मीडिया में फैले एक वीडियो, जिसमे दिखाया गया की कैसे खेल के आरम्भ से पूर्व खेल के खलनायक (साँड़) को शराब पिलाई जा रही और चोटे दी जा रही जिससे खलनायक खेल के दौरान ज़्यादा आक्रामक रहे। संभवतः इस वीडियो को देखने के बाद (पेटा) ने इस खेल पर प्रतिबन्ध लगाने की पहल की। अदालत ने सुनी भी। अनेक बड़ी हस्तियों ने प्रतिबन्ध पर अपनी मुहर लगाई। जिनमें बॉलीवुड के सितारे भी। सही है, कहीं एड़ियाँ रगड़ी जाती हैं और यहाँ एक तीर से दो निशाने लग रहे मौका क्यों चूकना। भलाई की भलाई और चर्चा में ख्याति।
इस पूरे विवादित घटनाचक्र में संतोषजनक बात यह है कि अभी तक इस विवाद को विशेष धर्म पर प्रहार का मोड़ नहीं मिल पाया है।
हमें यहाँ न तो इस विशेष खेल को भारत के अन्य खेलों, धार्मिक आयोजनों से या दुनिया के अनेक देशों में पशुओं के साथ खेले जाने वाले अनेक खेलों से तुलना करना चाहिए जिसमें बेजुबानों से उनकी राय लिए बगैर उन्हें उस कृत्य का हिस्सा बनाया जाता है। क्योंकि भारत में पहले से जारी शाहिष्डुता-अशहिष्डुता की लड़ाई में जुड़ने वाली यह नयी कड़ी अपने आप में ही घातक परिणाम लिए बैठी है। भारतीय संस्कृति तुलना से नहीं सिद्धांतों से चलती है और हमारे समाज को भी चलना चाहिए।
बात हो, तो बगैर पूर्वाग्रह के। ख़री। कल्याणकारी। प्रगतिशील।
क्योंकि यह खेल न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है। बल्कि मनुष्य और पशु के जीवन के तालमेल को भी दर्शाता है। पोंगल जो एक प्रकृति आधारित त्यौहार है। जहाँ बैलों का उपयोग कृषि में किया जाता है उसी संदर्भ में उनकी पूजा भी की जाती है। ऐसे में बैलों को इस त्यौहार में जोड़ने, संग भोगने का कार्य जल्लीकट्टू द्वारा हुआ। रही बात बैलों पर अत्याचार की तो प्रभु क्या आप बैलों से कबड्डी या दौड़ लगाएंगे? जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध के रूप में कील साबित हुई वीडियो में दिखाए गए बैलों को उकसाने की प्रक्रिया से अलग। बैलों को गाजे- बाजों से प्रतिभागियों द्वारा शोर मचा कर किया जाता है।
बैलों की प्रवित्ति के अनुसार, जो अपनी सिंग पर किसी का स्पर्श गवारा नहीं करते । उनके सींघो को पकड़ काबू करने , सिक्के निकालने का चलन हो गया। और मर्दों ने इसे स्वयं को समाज में वीर साबित करने का जरिया बना लिया।
मनुष्य- पशु के इस संयोग में पूर्वाग्रह से ग्रसित हो किसी विशेष घटना को दीर्घकालिक पैमाने के रूप में स्थापित करना हितकारी नहीं।
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