बीते दिनों दिवगंत मुख्यमंत्री जयललिता को सर्वोच्च न्यायालय ने मौत के पश्चात् भी किये गुनाहों को नहीं बख्शा।
तमिल जन-मानस में गहरी पैठ रखने वाली मुख्यमंत्री के निधन के तद्पश्चात जहाँ कई लोग मौत के धक्के से मौत को ग्रास हो गए तो कहीं उन्ही के चेले उनका नाम भुना कर सत्ता की दावेदारी कर रहे थे। ख्याति इतनी की जनता ने भारत की सर्वदा धिक्कारे गए क्षेत्र नेतागिरी को भारतीय जनमानस के सबसे उच्च पद देवी-देवताओं की श्रेणी में ला खड़ा किया। ऐसे व्यक्तित्व को मौत के बाद लोगों में उमड़े करुणा को ठुकराते हुए जेल की सज़ा सुनाना अपने अंतर्गत बड़े ठोस कदम लिए बैठा है।
हाँ, यह वही भारत है जहाँ लोगों का सरकारी महकमे से विश्वास उठ चुका है।
सर्वोच्च न्यायालय तो दूर उच्च न्यायलय भी नहीं विशेष अदालत ने भी देवी जयललिता के वर्चस्व को ठुकराते हुए सज़ा सुनाई।
देवी का रुतबा, उनकी लोकप्रियता, उनकी सत्ता का दमखम। इनमे से किसी की भी परवाह जजों ने नहीं की।
देवी का रुतबा, उनकी लोकप्रियता, उनकी सत्ता का दमखम। इनमे से किसी की भी परवाह जजों ने नहीं की।
समाज ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जो पहले अपने पुण्यो के लिए पूजे गए बाद में दुष्कर्मों के लिए दुत्कारे गए।
वहीं नरेंद्र मोदी को दंगो में क्लीन चिट देने के लिए कई लोग न्यायपालिका को कोसते हैं।
● हमारी न्यापालिका ने दंगल देखने के बाद महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों की ठानी जो उसके सन्दर्भ में पर्सनल मुस्लिम लॉ बोर्ड के दलीलों की ऐसी तैसी कर दी। मुस्लिम पर्सनल लॉ द्वारा मर्दों को दी गई सहूलियत जिसके द्वारा कोई भी मर्द कहीं भी बैठे तीन बार तलाक लिख व्हाट्सएप्प करदे तो उसे तलाक समझा जाता था। ऐसे दकियानूसी कानूनों पर जजों ने कानूनी कलम चला मामले का ढंग से संज्ञान लिया। जिसमे मुहमदन महिलाओं ने भी बढ़ कर फैसले का समर्थन किया।
परंतु भारत में बहुसंख्यक समाज के सिवाय अल्पसंख्यक समाज पर ज़्यादा ज़ुल्म और हस्तक्षेप होते हैं। इसी तथाकथित तर्कों पर मुस्लिम पर्सनल लॉ ने "आदेश" को चुनौती दी है। मेरा भारत चाहे जैसा भी हो, यहाँ खुले में कोई अनुचित सामाजिक कार्य न होता है न हो सकता है
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